बुधवार, 27 दिसंबर 2017

"ग़ालिब" के नाम खुला खत


मिर्ज़ा असदुल्लाह खां “ग़ालिब”
गली कासिम, बल्लीमारां,
दिल्ली


२७ दिसम्बर,२०१७

जनाब आदाब,

पहले-पहल आपको, आपके २२० वें यौम-ए-पैदाइश के मौके पर हमारी जानिब से दिली मुबारकबाद !! आज आपकी नज़र यह खुला खत हाज़िर कर रहा हूँ | आपसे मुखातिब होने का इससे बेहतर ज़रिया शायद मेरे पास नहीं है | वैसे आपसे मुखातिब होने के लिए यह अवसर और यह खत मात्र एक ज़रिया है, असल में यह मेरी दिली ख्वाइश थी कि जिस शख्स ने गुज़िश्ता  सालों में मुझे सबसे ज्यादा मुतासिर किया है, उससे इक गुफ्तगू का हक तो मुझ नाचीज़ के हिस्से आना ही चाहिए | तो लीजिए मैं हाज़िर हूँ, अपने खत के ज़रिए आपके दरमियाँ |

हाँ एक वादा किए देता हूँ यहाँ, चूँकि आज आप का दिन है तो ज़ाहिर है बात भी आपकी और आपके अशआरों की ही करूँगा | इसी बहाने साथ ही साथ एक कोशिश यह भी रहेगी कि अपनी सीखों को, आपकी शायरी के माध्यम से लोगों के रूबरू रखूँ ; जिससे लोग भी अपने भीतर, अपने अपने मिजाज़ का “ग़ालिब” ख़ोज सकें |
 

इब्तिदा करते हैं आपके तारुफ से, आपके ही लफ़्ज़ों में :

“वो यह कहतें हैं कि ग़ालिब कौन है ?
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या ?”
 


फक़त दो मिसरों में अपनी मकबूलियत, बड़ी खुद्दारी से बयाँ कर गए आप | और आगे यह शेर देखिए :

“पहले आती थी हाले-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती ” 


अब इसे शायर की उदास तबियत कहें या उसकी शक्सियत का बड़प्पन, आपके लिए यह फर्क कर पाना मुश्किल है | और अब देखें इन्तेज़ार की एक लाज़वाब मिसाल | दोनों मिसरे अपनी-अपनी हद में बोल रहे हैं, फिर भी क्या खूब शेर हुआ है :

“आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक ?”


इन दो मिसरों में तो कितनी सादगी से अपनी मिलनसारिता का ज़िक्र कर दिया आपने :

“मेहरबां होके बुला लो मुझे चाहो जिस वक्त,
मैं गया वक्त नहीं हूँ कि फिर आ भी ना सकूँ ”


हसरतों पर यूँ तो कई शायरों ने कई शेर कहे हैं मगर अंदाज़-ए-बयां ग़ालिब तो हमेशा से निराला ही रहा है | मसलन यह शेर देखें :

“मेरी किस्मत में गम गर इतना था,
दिल भी या रब, कई दिए होते” 


यकीनन ग़ालिब को दौर-ए-आज में वो शोहरत, वो मकबूलियत हासिल है, जिसे देख कर किसी भी शायर को रश्क हो जाए | खुद उनके समकालीन और उम्दा शायर रहे इब्राहिम जौक भी इस एहसास से खुदको दूर नहीं रख पाए थे | मगर देर सबेर वो भी खुद को “ग़ालिब” के शेरों पर दाद देने से नहीं रोक पाए थे | एक तो अपने हालातों की सच्चाइयां लिखना और तो और अगले ही मिसरे में मसाइलों से लड़ने का दम ख़म भी इस खूबी से लिख देना कि पढ़ने/सुनने वाले बरबस ही वाह !! कह उठे | यह देखिए उसकी मिसाल :

“रंज से खूगर हुआ इंसा तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ी इतनी कि आसां हो गई ” 


कज़ा हो चाहे जनाज़ा हो असद की उस्तादी कलम कुछ यूँ कमाल करती है जैसे इस दुनिया से परे एहसास को भी, पहले जी भर के जिया हो और फिर शेर कहा हो | मिसाल देखिए :

“जला है जिस्म जहाँ, दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू क्या है ? ”

 

या फिर यह शेर :

“हुए हम जो मरके रुसवा, हुए क्यों न गर्के-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता ” 


ग़ालिब ने इश्क-ए-मोहब्बत के फ़लक पर भी किस तरह कब्ज़ा किया हुआ है | आइये देखते हैं | शेर कुछ यूँ है कि :

“इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे कमाल के ”


या फिर यह शेर जो तकरीबन हर आशिक-ए-ग़ालिब को याद होगा :

“दिल-ए-नादां ! तुझे हुआ क्या है ?
आखिर इस दर्द की दवा क्या है ? ”


ग़ालिब वो सागर है जिसकी तह तक जाना और समझ पाना सभी के हिस्से में नहीं है | आखिर दिल से लिखी बात को कोई दिलवाला ही तो समझ सकता है | खैर ग़ज़ल और इसकी दीवानगी का सिलसिला तो बदस्तूर ज़ारी है और हमेशा रहेगा | यह खत भले ही अब अपने अंतिम दौर में हो, मगर यह कोशिश थी उस सागर में से इक बूँद उठाने की, जिसकी चमक वाकई किसी मोती से कमतर नहीं है |

इसी इल्तजा के साथ की ग़ज़ल से या यूँ कहें कि ग़ालिब से अपना राब्ता यूँ ही कायम रहे, हम निकलते हैं किसी नामाबर की तलाश में, जो इस खत को अपनी मंजिल दे सके |

आपका मुरीद,
गौरव दीक्षित “राहत”

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

वो लम्हा, एक मुद्दत और मैं



जाता हुआ वक्त सचमुच बेजुबां होता है | चुपचाप घड़ी-दर-घड़ी बिन अपने जाने का एहसास कराये बस बीत जाता है | यही वक्त बाद-मुद्दत के अचानक अपना एहसास करता है, जब वो एक दिन याद बनकर हमारे सामने आकार खड़ा हो जाता है | अब वही वक्त का कतरा, एक लम्हा, जाने अनजाने हमारे होशोहवास पर हावी होने लगता है | एक समय का बेजुबां अब बोल-बोलकर अपनी दास्ताँ सुनाता है | लम्हा-दर-लम्हा सब बयां करती है याद | रेशा-रेशा जेहन को टटोलती है, जाने कब के, कहाँ-कहाँ के राज खोलती है | वो राज जो हमने करीने से सजा कर रखे थे अपने सतही जेहन से दूर किसी और कोने में | वहीँ जहाँ से वो हमारे रोज़ में दखल न दे पाएं, हाँ मगर एक निश्चित वक्त के बाद जब हम अपनी यादों का संदूक खोलें तो हमें वैसे ही मिलें जैसे हमने उन्हें जिया था, कई अरसे पहले |

आज वही दिन है शायद | या यूँ कहूँ शाम है | कुछ यादों ने बरबस घेर लिया है मुझे | अपने आज में, अपने अतीत से घिरा मैं | अब मेरे लिए यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि इसका शुक्रगुज़ार होऊं कि अपने सुनहरे अतीत को फिर से जी लिया आज या इसका अफ़सोस करूँ कि हमारे अतीत ने फिर हमारे आज का एक लम्हा जाया कर दिया |

वैसे यह कशमकश शायद हम सबकी है और आज नहीं तो कल हम सब इससे दो – चार होंगे ही | बस  इतना ख्याल रखें कि इसे दो – चार से चार-आठ या आठ-दस न होने दें | वरना हमारा आने वाला कल हमें दोष देगा कि हमने अपने आज में कोई ऐसा लम्हा जिया ही नहीं, जिसे हम बरसों बाद याद करके मुस्कुरा सकें |

लेखक - गौरव दीक्षित "राहत"
© सर्वाधिकार सुरक्षित