शनिवार, 24 जनवरी 2015

आपबीती : ज़िंदगी का जायज़ा

आज कई दिनों बाद उगती हुई शाम देखी | यूँ लगा कि जैसे महीनों बीत गए हों हमें मिले हुए | कभी वो दिन भी थे जब तुम्हारा इन्तेज़ार रहता था | अब ज़िंदगी ने मसरूफियत सिखा दी है हमें | खुद अपने साथ बैठे हुए भी, तो एक अरसा बीत गया है अब | वैसे इस दौड़ती-भागती ज़िंदगी के कायल हम कभी नहीं रहे, लेकिन कुछ पलों के लिए, बहा लिया था इसने हमें अपने साथ |

आज शाम के सिरहाने बैठे हुए जब मुड़ कर देखा तो बहुत कुछ छूटा हुआ पाया | कुछ अधूरे पन्ने, कुछ अधूरी बातें और कुछ अध-बुने रिश्ते भी थे; जिन्हें हम दूर कहीं छोड़ आए थे | या यूँ कहें की एक दूरी बना ली थी हमने उनसे | एक अदृश्य सा समझोता कर रखा था हमने अपनी यादों से, ना वो हमारे आज में दखल देंगी, ना हम उनको याद करके कोई कष्ट पहुंचाएंगे |

आज जब फिर हकीकत से सामना हुआ, तो यह मालूम हुआ कि बहुत दूर निकल आएँ है हम अपनों की गली से | जिसे अब हम "सपनों की गली" भी कहने लगे हैं; क्योंकि कभी कभी लगता है कि यह हमारी ज़द में नहीं है | ऐसे में अपने ही एक शेर से हमने, आज अपनी ज़िंदगी का जायज़ा लिया | और जाने-अनजाने खुद को मना लिया |

वरक पलट लिए जो दिल के, 
तो जैसे खोई खुशी मिल गई |
गर ज़िंदगी इसी का नाम है तो,
हाँ मुझे मेरी ज़िंदगी मिल गई ||