आज कई दिनों बाद जो हम दोनों ने शाम देखी |
स्वर्णिम तेज लिए सूरज का धीरे धीरे ढलना .....
जिस कारण किरणें बादलों से छन कर आ रही थी |
एक नई सुबह को फिर मिलने का वादा करके .....
वो भी होले होले अपने बिस्तर में छुप गया शायद ||
आज कई दिनों बाद जो हम दोनों ने शाम देखी |
इधर पंछियों का कतारों में अपने घर वापस जाना .....
शाम की रुमानियत को यह निहित सन्देश भी दे गया की |
चाहें दिन भर कहीं भी रहो, कितना भी व्यस्त रहो .....
शाम ढले अपने, अपनों की खातिर घर को रुख ज़रूर करो ||
आज कई दिनों बाद जो हम दोनों ने शाम देखी |
मंद मंद हवा के झोंके, बारहा हमसे टकराकर .....
हमें हमारी गुमशुदगी का बखूबी एहसास करवा रहा थे |
ऐसी कितनी कहानियों का हम हिस्सा नहीं हो पाए .....
सचमुच इतने दिनों में बहुत कुछ है जो हमसे छूटा है ||
आज कई दिनों बाद जो हम दोनों ने शाम देखी |
तभी साथ वाली गलियों में कुछ लोग .....
दिन भर की थकन लेकर वापस घर को लौट आये थे |
बच्चे बाहर बेफिक्री से खेलने में मस्त थे ......
इस उम्मीद में कि पापा आयेंगे तो ज़रूर कुछ लायेंगे ||
आज कई दिनों बाद जो हम दोनों ने शाम देखी |
पीछे आरती और अजान रोज की तरह .....
इस शाम की अनोखी कहानी में अपना संगीत दे रहे थे |
जैसे इंसान को मुँह चिड़ा रहे हो कि तुम .....
लगे रहो अपनी ज़द्दोज़हद में, हम ऐसे ही निर्बाद्ध रहेंगे ||
आज कई दिनों बाद जो हम दोनों ने शाम देखी |
ऐसे में हम, यानी मैं और मेरा कवि मन ......
रिहायशी पांच मंजिला ईमारत की खुली छत पर |
निपट अकेले में बैठेकर, शाम को और .....
कुछ कुछ जिंदगी को भी आता जाता देख रहे थे ||
और फिर अपना ही एक शेर याद करते हुए हम ...
...जिंदगी का खुद से दुबारा तारुफ्फ़ करवाने में लग गए :
“ समय जो हाथों से फ़िज़ूल खो रहा है |
गर्द में मिलके वो भी धूल हो
रहा है || ”