ज़िंदगी की रुसवाई देख |
फिर वहीँ ले आई देख ||
कद से बात नहीं बनती |
तू सोच की ऊँचाई देख ||
मुझको छोटा कहने वाले |
तू अपनी गहराई देख ||
इतना मीठा बोले है तू |
बातों की तुरपाई देख ||
औरों के ही ऐब दिखे हैं |
अपनी भी बुराई देख ||
पहले जग में मन लगा तू |
फिर जग की तन्हाई देख ||
खुद से बातें करते करते |
आँख मेरी लग आई देख ||
पहले घर की आग बुझा तू |
फिर किसने आग लगाई देख ||
ज़रा सा छेड़ा क्या ज़िंदगी को |
कितनी वो घबराई देख ||
जी ऐसे किरदार में "राहत" |
कैद देख न तू रिहाई देख ||
© गौरव दीक्षित "राहत"
फिर वहीँ ले आई देख ||
कद से बात नहीं बनती |
तू सोच की ऊँचाई देख ||
मुझको छोटा कहने वाले |
तू अपनी गहराई देख ||
इतना मीठा बोले है तू |
बातों की तुरपाई देख ||
औरों के ही ऐब दिखे हैं |
अपनी भी बुराई देख ||
पहले जग में मन लगा तू |
फिर जग की तन्हाई देख ||
खुद से बातें करते करते |
आँख मेरी लग आई देख ||
पहले घर की आग बुझा तू |
फिर किसने आग लगाई देख ||
ज़रा सा छेड़ा क्या ज़िंदगी को |
कितनी वो घबराई देख ||
जी ऐसे किरदार में "राहत" |
कैद देख न तू रिहाई देख ||
© गौरव दीक्षित "राहत"