शनिवार, 21 मार्च 2015

ज़िंदगी की रुसवाई देख : ग़ज़ल

ज़िंदगी की रुसवाई देख |
फिर वहीँ ले आई देख ||

कद से बात नहीं बनती |
तू सोच की ऊँचाई देख ||

मुझको छोटा कहने वाले |
तू अपनी गहराई देख ||

इतना मीठा बोले है तू |
बातों की तुरपाई देख ||

औरों के ही ऐब दिखे हैं |
अपनी भी बुराई देख ||

पहले जग में मन लगा तू |
फिर जग की तन्हाई देख ||

खुद से बातें करते करते |
आँख  मेरी लग आई देख ||

पहले घर की आग बुझा तू |
फिर किसने आग लगाई देख ||

ज़रा सा छेड़ा क्या ज़िंदगी को |
कितनी वो घबराई देख ||

जी ऐसे किरदार में "राहत" |
कैद देख न तू रिहाई देख ||

© गौरव दीक्षित "राहत"