रविवार, 13 सितंबर 2015

नज़्म : जिंदा हूँ मैं !!


थामती है हाथ मेरा
वो हर रोज
और फिर
धीमी आवाज़ में
कुछ खुसफुसाहट होती है,
मानो कुछ
कहना चाहती हो मुझसे |


पर जाने क्यों
मुझको दुलार कर
वो धीरे से कहीं
खो जाती है |
उन्हीं हवाओं के दरमियाँ
जहाँ हम पहली बार मिले थे |

कुछ पल के लिए
छोड़कर मुझे
अनगिनत सवालों के बीच |

क्या कहना था उसको ?
शायद मुझे
आई थी समझाने
या फिर
दिन भर के ऐब गिनाने
या उसकी सुध लेने
जो घटता है मेरे भीतर |

खैर जो कुछ भी हो
पर यह सिलसिला जारी है
आज भी निर्बाध |

वो भले बोलती ना हो
पर बखूबी
कह जाती है अपनी बात |

दुनिया के इस
भागमभाग खेल में होते हुए भी
आज भी पूरी शिद्दत से
मिलता हूँ उससे |

इस उम्मीद पर कि
वो जो मेरी ज़िंदगी है
कहीं मुझसे दूर ना हो जाए |

शायद इसलिए ही आज भी
दिल से
जिंदा हूँ मैं |

हाँ इसीलिए
जिंदा हूँ मैं ||

कवि : गौरव दीक्षित "राहत"
© सर्वाधिकार सुरक्षित
‪

शनिवार, 29 अगस्त 2015

एक छंदमुक्त कविता : कब समझोगे तुम आखिर


कब समझोगे तुम आखिर
फक्त रास्तों पे
तन्हा चलने से कोई
सफर नहीं होता | 


सारे सुख सुविधा के साधन
भर लिए हैं फिर भी
घर अपना यह क्यों
घर नहीं होता |

ताकता है क्यों
हर एक को सहारे की नज़र से
गर चेत जाते पहले तो
यह मंज़र नहीं होता |

जो सबको मिलने का खुद से
मौका न दिया होता
कोई दरिया ही रहता वो
समंदर नहीं होता |

आदमीं अक्सर खुद में कई
राज लिए होता है
जैसा दिखता है वो बाहर
भीतर नहीं होता |

कभी इतने बडबोले होते हैं
कि कुछ भी कह जाते हैं
और कभी पास हमारे ख़ामोशी का
उत्तर नहीं होता |

सुना था किस्से कहानियों में
जीतता है सच आखिर
मगर आज की दुनिया में ऐसा
अक्सर नहीं होता |

तुम बड़े ओहदों पर हो
तो अपना भी मान रखो
जो गिर जाए किसी के क़दमों में
काम का वो सर नहीं होता |

कलमकार : गौरव दीक्षित “राहत”
© सर्वाधिकार सुरक्षित
‪

शनिवार, 21 मार्च 2015

ज़िंदगी की रुसवाई देख : ग़ज़ल

ज़िंदगी की रुसवाई देख |
फिर वहीँ ले आई देख ||

कद से बात नहीं बनती |
तू सोच की ऊँचाई देख ||

मुझको छोटा कहने वाले |
तू अपनी गहराई देख ||

इतना मीठा बोले है तू |
बातों की तुरपाई देख ||

औरों के ही ऐब दिखे हैं |
अपनी भी बुराई देख ||

पहले जग में मन लगा तू |
फिर जग की तन्हाई देख ||

खुद से बातें करते करते |
आँख  मेरी लग आई देख ||

पहले घर की आग बुझा तू |
फिर किसने आग लगाई देख ||

ज़रा सा छेड़ा क्या ज़िंदगी को |
कितनी वो घबराई देख ||

जी ऐसे किरदार में "राहत" |
कैद देख न तू रिहाई देख ||

© गौरव दीक्षित "राहत"

शनिवार, 24 जनवरी 2015

आपबीती : ज़िंदगी का जायज़ा

आज कई दिनों बाद उगती हुई शाम देखी | यूँ लगा कि जैसे महीनों बीत गए हों हमें मिले हुए | कभी वो दिन भी थे जब तुम्हारा इन्तेज़ार रहता था | अब ज़िंदगी ने मसरूफियत सिखा दी है हमें | खुद अपने साथ बैठे हुए भी, तो एक अरसा बीत गया है अब | वैसे इस दौड़ती-भागती ज़िंदगी के कायल हम कभी नहीं रहे, लेकिन कुछ पलों के लिए, बहा लिया था इसने हमें अपने साथ |

आज शाम के सिरहाने बैठे हुए जब मुड़ कर देखा तो बहुत कुछ छूटा हुआ पाया | कुछ अधूरे पन्ने, कुछ अधूरी बातें और कुछ अध-बुने रिश्ते भी थे; जिन्हें हम दूर कहीं छोड़ आए थे | या यूँ कहें की एक दूरी बना ली थी हमने उनसे | एक अदृश्य सा समझोता कर रखा था हमने अपनी यादों से, ना वो हमारे आज में दखल देंगी, ना हम उनको याद करके कोई कष्ट पहुंचाएंगे |

आज जब फिर हकीकत से सामना हुआ, तो यह मालूम हुआ कि बहुत दूर निकल आएँ है हम अपनों की गली से | जिसे अब हम "सपनों की गली" भी कहने लगे हैं; क्योंकि कभी कभी लगता है कि यह हमारी ज़द में नहीं है | ऐसे में अपने ही एक शेर से हमने, आज अपनी ज़िंदगी का जायज़ा लिया | और जाने-अनजाने खुद को मना लिया |

वरक पलट लिए जो दिल के, 
तो जैसे खोई खुशी मिल गई |
गर ज़िंदगी इसी का नाम है तो,
हाँ मुझे मेरी ज़िंदगी मिल गई ||