थामती है हाथ मेरा
वो हर रोज
और फिर
धीमी आवाज़ में
कुछ खुसफुसाहट होती है,
मानो कुछ
कहना चाहती हो मुझसे |
पर जाने क्यों
मुझको दुलार कर
वो धीरे से कहीं
खो जाती है |
उन्हीं हवाओं के दरमियाँ
जहाँ हम पहली बार मिले थे |
कुछ पल के लिए
छोड़कर मुझे
अनगिनत सवालों के बीच |
क्या कहना था उसको ?
शायद मुझे
आई थी समझाने
या फिर
दिन भर के ऐब गिनाने
या उसकी सुध लेने
जो घटता है मेरे भीतर |
खैर जो कुछ भी हो
पर यह सिलसिला जारी है
आज भी निर्बाध |
वो भले बोलती ना हो
पर बखूबी
कह जाती है अपनी बात |
दुनिया के इस
भागमभाग खेल में होते हुए भी
आज भी पूरी शिद्दत से
मिलता हूँ उससे |
इस उम्मीद पर कि
वो जो मेरी ज़िंदगी है
कहीं मुझसे दूर ना हो जाए |
शायद इसलिए ही आज भी
दिल से
जिंदा हूँ मैं |
हाँ इसीलिए
जिंदा हूँ मैं ||
कवि : गौरव दीक्षित "राहत"
© सर्वाधिकार सुरक्षित
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
प्रतिक्रिया / सुझाव देने के लिए शुक्रिया !!!