रविवार, 13 सितंबर 2015

नज़्म : जिंदा हूँ मैं !!


थामती है हाथ मेरा
वो हर रोज
और फिर
धीमी आवाज़ में
कुछ खुसफुसाहट होती है,
मानो कुछ
कहना चाहती हो मुझसे |


पर जाने क्यों
मुझको दुलार कर
वो धीरे से कहीं
खो जाती है |
उन्हीं हवाओं के दरमियाँ
जहाँ हम पहली बार मिले थे |

कुछ पल के लिए
छोड़कर मुझे
अनगिनत सवालों के बीच |

क्या कहना था उसको ?
शायद मुझे
आई थी समझाने
या फिर
दिन भर के ऐब गिनाने
या उसकी सुध लेने
जो घटता है मेरे भीतर |

खैर जो कुछ भी हो
पर यह सिलसिला जारी है
आज भी निर्बाध |

वो भले बोलती ना हो
पर बखूबी
कह जाती है अपनी बात |

दुनिया के इस
भागमभाग खेल में होते हुए भी
आज भी पूरी शिद्दत से
मिलता हूँ उससे |

इस उम्मीद पर कि
वो जो मेरी ज़िंदगी है
कहीं मुझसे दूर ना हो जाए |

शायद इसलिए ही आज भी
दिल से
जिंदा हूँ मैं |

हाँ इसीलिए
जिंदा हूँ मैं ||

कवि : गौरव दीक्षित "राहत"
© सर्वाधिकार सुरक्षित
‪

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