शनिवार, 29 अगस्त 2015

एक छंदमुक्त कविता : कब समझोगे तुम आखिर


कब समझोगे तुम आखिर
फक्त रास्तों पे
तन्हा चलने से कोई
सफर नहीं होता | 


सारे सुख सुविधा के साधन
भर लिए हैं फिर भी
घर अपना यह क्यों
घर नहीं होता |

ताकता है क्यों
हर एक को सहारे की नज़र से
गर चेत जाते पहले तो
यह मंज़र नहीं होता |

जो सबको मिलने का खुद से
मौका न दिया होता
कोई दरिया ही रहता वो
समंदर नहीं होता |

आदमीं अक्सर खुद में कई
राज लिए होता है
जैसा दिखता है वो बाहर
भीतर नहीं होता |

कभी इतने बडबोले होते हैं
कि कुछ भी कह जाते हैं
और कभी पास हमारे ख़ामोशी का
उत्तर नहीं होता |

सुना था किस्से कहानियों में
जीतता है सच आखिर
मगर आज की दुनिया में ऐसा
अक्सर नहीं होता |

तुम बड़े ओहदों पर हो
तो अपना भी मान रखो
जो गिर जाए किसी के क़दमों में
काम का वो सर नहीं होता |

कलमकार : गौरव दीक्षित “राहत”
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