कब समझोगे तुम आखिर
फक्त रास्तों पे
तन्हा चलने से कोई
सफर नहीं होता |
सारे सुख सुविधा के साधन
भर लिए हैं फिर भी
घर अपना यह क्यों
घर नहीं होता |
ताकता है क्यों
हर एक को सहारे की नज़र से
गर चेत जाते पहले तो
यह मंज़र नहीं होता |
जो सबको मिलने का खुद से
मौका न दिया होता
कोई दरिया ही रहता वो
समंदर नहीं होता |
आदमीं अक्सर खुद में कई
राज लिए होता है
जैसा दिखता है वो बाहर
भीतर नहीं होता |
कभी इतने बडबोले होते हैं
कि कुछ भी कह जाते हैं
और कभी पास हमारे ख़ामोशी का
उत्तर नहीं होता |
सुना था किस्से कहानियों में
जीतता है सच आखिर
मगर आज की दुनिया में ऐसा
अक्सर नहीं होता |
तुम बड़े ओहदों पर हो
तो अपना भी मान रखो
जो गिर जाए किसी के क़दमों में
काम का वो सर नहीं होता |
कलमकार : गौरव दीक्षित “राहत”
© सर्वाधिकार सुरक्षित
भर लिए हैं फिर भी
घर अपना यह क्यों
घर नहीं होता |
ताकता है क्यों
हर एक को सहारे की नज़र से
गर चेत जाते पहले तो
यह मंज़र नहीं होता |
जो सबको मिलने का खुद से
मौका न दिया होता
कोई दरिया ही रहता वो
समंदर नहीं होता |
आदमीं अक्सर खुद में कई
राज लिए होता है
जैसा दिखता है वो बाहर
भीतर नहीं होता |
कभी इतने बडबोले होते हैं
कि कुछ भी कह जाते हैं
और कभी पास हमारे ख़ामोशी का
उत्तर नहीं होता |
सुना था किस्से कहानियों में
जीतता है सच आखिर
मगर आज की दुनिया में ऐसा
अक्सर नहीं होता |
तुम बड़े ओहदों पर हो
तो अपना भी मान रखो
जो गिर जाए किसी के क़दमों में
काम का वो सर नहीं होता |
कलमकार : गौरव दीक्षित “राहत”
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