शनिवार, 13 दिसंबर 2014

तो क्यों न मैं इस जहाँ से बगावत करूँ ?



क्या चमक थी आँखों में,
सपने हज़ार रहते थे |
जिंदगी तुझसे मिलने को
हम बेक़रार रहते थे |
फिर भी इन खावाबिदा आँखों को,
जब सहारा न दे पाए तेरे उसूल |  
तो क्यों न मैं इस जहाँ से बगावत करूँ ?

चाँद तकिये तले रहता था,
सितारे छत पर जगमगाते थे |
ग़ज़ल ज़ेहन में रहती थी,
हम लिखते थे, गुनगुनाते थे |
आज मगर तेरी बंदिशों में,
नज़र नहीं आते कोई दूर तक |
तो क्यों न मैं इस जहाँ से बगावत करूँ ?

रिश्ते क्या हैं,
खुद-ब-खुद बन जाते हैं |
पहले हम मिलते हैं,
दिल भी फिर मिल जाते हैं |
और इस पर भी जब कोई रास्ता,
तेरी गली से नज़र न आए |
तो क्यों न मैं इस जहाँ से बगावत करूँ ?

हम हुनर पे रखते हैं भरोसा,
तुम्हें यकीं कागजी सनद पर है |
है सवाल गर यह तो,
काबिलियत के कद पर है |
हम निभाने में रहे जिम्मेवारी,
और तुम जताने में |
तो क्यों न मैं इस जहाँ से बगावत करूँ ?

रविवार, 9 नवंबर 2014

आज कई दिनों बाद जो हम दोनों ने शाम देखी



आज कई दिनों बाद जो हम दोनों ने शाम देखी |

स्वर्णिम तेज लिए सूरज का धीरे धीरे ढलना .....
जिस कारण किरणें बादलों से छन कर आ रही थी |
एक नई सुबह को फिर मिलने का वादा करके .....
वो भी होले होले अपने बिस्तर में छुप गया शायद ||

आज कई दिनों बाद जो हम दोनों ने शाम देखी |

इधर पंछियों का कतारों में अपने घर वापस जाना .....
शाम की रुमानियत को यह निहित सन्देश भी दे गया की |
चाहें दिन भर कहीं भी रहो, कितना भी व्यस्त रहो .....
शाम ढले अपने, अपनों की खातिर घर को रुख ज़रूर करो ||

आज कई दिनों बाद जो हम दोनों ने शाम देखी |

मंद मंद हवा के झोंके, बारहा हमसे टकराकर .....
हमें हमारी गुमशुदगी का बखूबी एहसास करवा रहा थे |
ऐसी कितनी कहानियों का हम हिस्सा नहीं हो पाए .....
सचमुच इतने दिनों में बहुत कुछ है जो हमसे छूटा है ||

आज कई दिनों बाद जो हम दोनों ने शाम देखी |

तभी साथ वाली गलियों में कुछ लोग .....
दिन भर की थकन लेकर वापस घर को लौट आये थे |
बच्चे बाहर बेफिक्री से खेलने में मस्त थे ......
इस उम्मीद में कि पापा आयेंगे तो ज़रूर कुछ लायेंगे ||

आज कई दिनों बाद जो हम दोनों ने शाम देखी |

पीछे आरती और अजान रोज की तरह .....
इस शाम की अनोखी कहानी में अपना संगीत दे रहे थे |
जैसे इंसान को मुँह चिड़ा रहे हो कि तुम .....
लगे रहो अपनी ज़द्दोज़हद में, हम ऐसे ही निर्बाद्ध रहेंगे ||

आज कई दिनों बाद जो हम दोनों ने शाम देखी |

ऐसे में हम, यानी मैं और मेरा कवि मन ......
रिहायशी पांच मंजिला ईमारत की खुली छत पर |
निपट अकेले में बैठेकर, शाम को और .....
कुछ कुछ जिंदगी को भी आता जाता देख रहे थे ||

और फिर अपना ही एक शेर याद करते हुए हम ...
...जिंदगी का खुद से दुबारा तारुफ्फ़ करवाने में लग गए :

“ समय जो हाथों से फ़िज़ूल खो रहा है |
  गर्द में मिलके वो भी धूल हो रहा है || ”

शनिवार, 1 नवंबर 2014

हकीकत से मिलती सपनो वाली दुनिया



सपने हमेशा इंसान को जीने की हिम्मत दे जाते है | वक्त जो हमेशा हमसे तेज चलने को आमादा है, हर चीज को हमसे दूर करने की कोशिश करता रहता है | कभी – कभी सफल भी हो जाता है अपने इस नापाक इरादे में | हम आज के आनंद वाली धारणा के खिलाफ नहीं हैं लेकिन न जाने क्यों हमें सुकून उस हकीकत में मिलता है, जो कभी हमने सपनो में देखी थी | सपने जो अपने मुकाम तक पहुंचे, जिन्हें अपने हिस्से की उम्मीद भी मिली और होंसला भी | आज अपनी मंजिल पर पहुंचकर दूर किसी फलक के सितारे हो गए हैं; वो सारे सपने | हर एक सपना, आज हकीकत बन अपनी ही चमक बिखेरता हुआ, इस दुनिया को छोटा साबित कर रहा है |

लोगों का हुजूम भी हमें कभी अच्छा नहीं लगा | हमें तो खुले आँगन में अकेले लेटकर अपनी ही खवाबों की दुनिया में धूप सेकना हमेशा भाता था | या फिर बड़ी - बड़ी खिड़कियों वाले अपने दफ्तर से सुदूर पहाड़ों को घंटों निहारते रहना | संग में कुछ पुराने नगमें यकबयक ज़ेहन में घर कर जाते | और फिर क्या; अगला पल तब बीतता जब हम गुनगुनाने लगते | सच में बड़े ही सुकून भरे होते थे वो फुर्सत के लम्हें | पर अब मसरूफियत ने घेर रखा है | चारों तरफ लोग हैं, अपने अपने काम लिए | सभी औरों के चक्कर लगाने में व्यस्त हैं, जैसे खुद की किसी को परवाह ही नहीं | पर हम इन जग निर्मित सरोकारों से कोई वास्ता नहीं रखते | अपनी धुन में रहते हैं, अपनी मर्ज़ी की करते हैं | या यूँ कहें जीवन रूपी गाड़ी को अपने ही अंदाज में हांक रहे हैं और इसी जद्दोजहद में इसका भरपूर लुत्फ़ भी उठा रहे हैं |

हाँ भले ही इस तरह भागदौड़ वाली जिंदगी जीने में कुछ तौर तरीके बदल गए हैं, साधन भी बदल गए हैं लेकिन मिजाज़ नहीं बदला | वक्त के दामन से एक लम्हां चुराकर, लिखने का अवसर निकाल ही लेता हूँ | और इसका नतीजा, वही सुकून जिसकी तलाश में सब जिंदगी भर भटकते हैं पर जो हमारा पुराना साथी रहा है |

तो फिर आप सोच क्या रहे हैं अबतक ? कुछ समय अपने लिए निकालिए | बंद पड़ी अलमारी से अपने पुराने शौक को आज़ाद करिये | ख़वाब देखना शुरू करिये, ऐसे ख़वाब जो आपके अपने हों, अजीज़ हों | फिर देखिए कैसे कुछ ख़वाब आपके शौक से मिलकर एक जूनून कायम करते हैं | फिर आपके ख़वाब सिर्फ ख़वाब न रहकर दरअसल एक हकीकत में तब्दील हो जायेंगे | और आप भी मेरी तरह यह फक्र से कह पाएंगे “ हाँ हमने देखी है हकीकत से मिलती सपनो वाली दुनिया ” |